Classification of Plants (पौधों का वर्गीकरण)

एक तरह के पौधों को एक साथ रखना, जिसमें उनकी बनावट या फैलाव के तरीके दिखाई देते हैं, वर्गीकरण कहलाता है। इसके बिना पता लगाना मुश्किल होता कि कौन सा पौधा किससे मिलता-जुलता है या कैसे बदला है समय के साथ।
पादप जगत को पाँच मुख्य समूहों में रखा गया है: थैलोफाइटा पौधों की दुनिया में सबसे सीधी बनावट वाला ग्रुप है। शरीर टुकड़ों में नहीं बंटा होता, इसलिए न जड़ न तना न पत्ती अलग-अलग नजर आती है। उल्टा पूरा ढांचा “थैलस” के नाम से पुकारा जाता है। ये जमीन पर गीली जगह या पानी के भीतर रह लेते हैं। इनकी बनावट इतनी सीधी होती है कि कई बार देखने में धुंधले से लगते हैं।

थैलोफाइटा

थैलोफाइटा पौधों की दुनिया में सबसे सीधी बनावट वाला ग्रुप है। शरीर टुकड़ों में नहीं बंटा होता, इसलिए न जड़ न तना न पत्ती अलग-अलग नजर आती है। उल्टा पूरा ढांचा “थैलस” के नाम से पुकारा जाता है। ये जमीन पर गीली जगह या पानी के भीतर रह लेते हैं। इनकी बनावट इतनी सीधी होती है कि कई बार देखने में धुंधले से लगते हैं।
थैलोफाइटा में शैवाल ही मुख्य होते हैं। उनमें क्लोरोफिल होने से प्रकाश संश्लेषण होता है, और खाना खुद बन जाता है। इनका प्रजनन कभी दो भागों में बँटकर होता है, कभी छोटे-छोटे बीजाणुओं से। एककोशिकीय हो सकते हैं ये, फिर भी बहुकोशिकीय वाले भी मिलते हैं। पर किसी में भी उच्च संरचना वाले ऊतक नहीं पाए जाते।

ब्रायोफाइटा

ब्रायोफाइटा पौधों की दुनिया में बहुत खास जगह रखते हैं – थैलोफाइटा से आगे, पर प्टेरिडोफाइटा से पीछे। इन्हें धरती पर रहने वाले ऐसे पौधे कहेंगे जिनके लिए प्रजनन में पानी जरूरी है, ठीक जैसे मेढ़क। ऊँचाई में कम, गठन में नाजुक, ये पौधे असली जड़-तना-पत्ती के बिना भी जीवित रहते हैं। जगह-जगह राइजोइड्स फैले होते हैं, जो न सिर्फ पकड़ बनाए रखते हैं, बल्कि थोड़ा पानी भी खींच लेते हैं।
इन पौधों में xylem व phloem नहीं होता, तो ऊंचाई कम रह जाती है, फिर भी उनके भीतर पानी और खनिज सामान्य ढंग से घूमते हैं। जैसे-जैसे छांव बढ़ती है, नमी के कारण वे जंगल की मिट्टी, चट्टानों के किनारे या गीली दीवारों पर आराम से बस जाते हैं। शरीर के अंदर दो हिस्से होते हैं – एक तरफ gametophyte, तो दूसरी ओर sporophyte, जहां gametophyte सब पर छा जाता है।
ये दो तरीकों से फैलते हैं – एक तो बिना जोड़े, एवं दूसरा नर-मादा के जरिये। बिना जोड़े की प्रक्रिया में छोटे-छोटे बीजाणु काम आते हैं, जबकि दूसरे में अंग उगते हैं। नर अंग से शुक्राणु पैदा होते हैं, ये पानी में तैरकर मादा अंग तक जाते हैं, वहाँ मिलावट होती है। उसके बाद एक नया ढांचा बनता है, जो दूसरे पौधे के ऊपर टिका रहता है।

मोस के प्रकार को लगभग तीन श्रेणियों में रखा जाता है –

  • मार्केन्शिया के उदाहरण सहित लीवरवर्ट।
  • Funaria की तरह मॉस होते हैं।
  • हॉर्नवर्ट (Hornworts)

शैवाल

पानी में रहने वाले कुछ हरे पौधे शैवाल कहलाते हैं, ये थैलोफाइटा ग्रुप से जुड़े होते हैं। अलग-अलग हिस्सों की बजाय इनका पूरा शरीर एक थैलस होता है, जिसमें न जड़ होती है न तना या पत्ती। इनके अंदर क्लोरोफिल मौजूद रहता है, इसी चीज की वजह से ये धूप में खाना बना लेते हैं। एक छोटे से ढांचे में रहकर भी ये अपनी जरूरत का भोजन खुद तैयार कर लेते हैं।

कुछ शैवाल सिर्फ एक कोशिका के होते हैं, मसलन क्लोरेला, जबकि कई कोशिकाओं वाले भी होते हैं – उदाहरण के तौर पर स्पाइरोगाइरा। पानी के अंदर, चाहे वह मीठा हो या खारा, या फिर गीली मिट्टी जैसी जगहों पर ये आसानी से पनप लेते हैं। इनकी प्रजनन-प्रक्रिया कभी छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटने से होती है, कभी कोशिका के बँट जाने से, तो कभी बीजाणुओं के ज़रिए। समुद्र या तालाब में रहने वाले जीवों के लिए तो ये खाने का मुख्य जरिया ही हैं, साथ ही हवा में ऑक्सीजन डालने में भी ये अहम भूमिका निभाते हैं।

प्टेरिदोफाइटा

प्टेरिदोफाइटा ब्रायोफाइटा की तुलना में आगे के चरण पर होते हैं। इनमें जड़, तना और पत्तियाँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं – ऐसा पहली बार होता है। उगने के लिए ये बीजों के बजाय बीजाणुओं पर भरोसा करते हैं। एक अहम बात? इनमें वाहिकीय ऊतक होते हैं। इसके कारण पानी और खाद्य पदार्थों का अंदरूनी संचरण हो पाता है।
अक्सर नमी भरी जगहों पर मिलते हैं प्टेरिडोफाइटा, खासकर घने जंगलों या नदी किनारे। एक तबके में गैमेटोफाइट रहता है, दूसरे में स्पोरोफाइट – दोनों में यह जीवन आगे बढ़ता है। इसमें जो पौधे होते हैं, उनमें से कई स्वतंत्र रूप से जीवन जीते हैं। फर्न, इक्विसेटम और लाइकोपोडियम ऐसे पौधों के कुछ नाम हैं। आकार में तो वे ठीक-ठाक होते हैं, पर संरचना में ब्रायोफाइटा से कहीं आगे।

जिम्नोस्पर्म

बीज धारण करने वाले पौधों में जिम्नोस्पर्म खुले बीज वाले होते हैं – ये फल के भीतर सुरक्षित नहीं मिलते। इनका बीज सीधे शंकुओं पर लगा रहता है, ढका हुआ नहीं। पादप जगत में ये प्रगति के पड़ाव पर हैं, तभी भी फूल वाले पौधों से पीछे। इनमें फूल नहीं आते, न ही फल बनता है, फिर भी ये जीवित रहते हैं।

जिम्नोस्पर्म की जड़ें मजबूत होती हैं, इसके बावजूद तना सीधा उठा रहता है। पत्तियों का गठन मोटा होता है, बीच-बीच में वाहिकाएँ जल संवहन करती हैं। शीतल जगहों पर ये आबाद रहते हैं, कभी-कभी पहाड़ियों के ढालों पर भी घर बनाते हैं। इनमें से ज्यादातर पेड़ सालभर हरे रहते हैं, ऐसे में पाइन या साइकेस खास उदाहरण बन जाते हैं। बीज उत्पन्न करके ये अपनी प्रजाति आगे बढ़ाते हैं, फिर भी फल बनने का झंझट नहीं होता। निषेचन धीमा होता है, एंजियोस्पर्म के मुकाबले यहाँ रास्ता छोटा होता है।

एंजियोस्पर्म

फूल वाले पौधों को एंजियोस्पर्म कहते हैं, ये पेड़-पौधों में सबसे आगे हैं। इनकी पहचान यह है कि फूल खिलने के बाद बीज फल में छुपे रहते हैं। वहीं, गिम्नोस्पर्म में ऐसा नहीं होता – बीज बाहर रहते हैं। यही बात इन दोनों के बीच फर्क बन जाती है।
अच्छी तरह बढ़े हुए पौधों में जड़, तना, पत्तियाँ और xylem-phloem जैसे ऊतक मिलते हैं, इसलिए ये आगे की ओर बढ़ पाते हैं। फूल खिलने के बाद पराग के स्थानांतरण और निषेचन के बाद एंजियोस्पर्म फल व बीज बनाते हैं। इन्हें Monocot और Dicot में बांटा गया है – गेहूं-चावल एकबीजपत्री हैं, मटर-सरसों द्विबीजपत्री। लगभग हर जगह मिलने वाले ये पौधे भोजन, दवा और अन्य चीजों के लिए उपयोगी हैं।

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