अलंकार किसे कहते हैं? अलंकार के भेद, परिभाषा और उदाहरण (Alankar in Hindi Grammar)

हिंदी व्याकरण और साहित्य में अलंकार (Alankar)का एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। जब भी हम किसी कविता, कहानी या काव्य को पढ़ते हैं, तो उसमें जो सुंदरता, लय और आकर्षण होता है, वह अलंकार के कारण ही आता है। जो छात्र बोर्ड परीक्षा (Class 9, 10, 11, 12) या किसी भी प्रतियोगी परीक्षा (UP Police, CTET, SSC GD, Patwari) की तैयारी कर रहे हैं, उनके लिए अलंकार को समझना बहुत आवश्यक है।

इस विस्तृत लेख में हम जानेंगे कि अलंकार किसे कहते हैं, अलंकार के कितने भेद होते हैं (Alankar ke bhed), उनकी परिभाषा और उदाहरण क्या हैं? और परीक्षाओं में अलंकार को पहचानने की सबसे आसान ट्रिक्स क्या हैं।


अलंकार का अर्थ और परिभाषा (Meaning and Definition of Alankar)

जिस प्रकार एक स्त्री अपनी सुंदरता को बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार के आभूषणों (गहनों) का प्रयोग करती है, ठीक उसी प्रकार कवि अपनी कविता या काव्य की सुंदरता और शोभा बढ़ाने के लिए जिन शब्दों और अर्थों का प्रयोग करता है, उन्हें अलंकार कहते हैं।

  • ‘अलंकार’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है:अलम् + कार
  • यहाँ ‘अलम्’ का अर्थ है – आभूषण, गहना या सजावट और ‘कार’ का अर्थ है – करने वाला


अलंकार के मुख्य भेद (Types of Alankar in Hindi)


मुख्य रूप से अलंकार के तीन भेद माने जाते हैं, लेकिन हिंदी व्याकरण में आमतौर पर पहले दो (शब्दालंकार और अर्थालंकार) का ही सबसे ज्यादा अध्ययन किया जाता है।

1. शब्दालंकार (Shabdalankar) – शब्दों के माध्यम से चमत्कार।
2. अर्थालंकार (Arthalankar) – अर्थ के माध्यम से चमत्कार।
3. उभयालंकार (Ubhayalankar)- शब्द और अर्थ दोनों के माध्यम से चमत्कार।

1. शब्दालंकार (Shabdalankar)

जब किसी काव्य में शब्दों के प्रयोग के कारण कोई चमत्कार या सौंदर्य उत्पन्न होता है, तो उसे शब्दालंकार कहते हैं। शब्दालंकार की सबसे बड़ी पहचान यह है कि यदि हम उस विशिष्ट शब्द को हटाकर उसका कोई पर्यायवाची (Synonym) शब्द रख दें, तो वह चमत्कार या सुंदरता खत्म हो जाती है।

शब्दालंकार के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं:

A. अनुप्रास अलंकार (Anupras Alankar)

जब किसी कविता में एक ही वर्ण (अक्षर) की आवृत्ति (Repetition) बार-बार होती है, जिससे भाषा में एक विशेष प्रकार की लय और सौंदर्य पैदा होता है, तो वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

उदाहरण:
चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही थीं जल थल में।(स्पष्टीकरण: यहाँ ‘च’ वर्ण की आवृत्ति बार-बार हुई है, जिससे वाक्य में सुंदरता आई है।)

“तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।”(स्पष्टीकरण: यहाँ ‘त’ वर्ण की आवृत्ति बार-बार हुई है।)

रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम।” (स्पष्टीकरण: यहाँ ‘र’ वर्ण की लगातार आवृत्ति हुई है।)

अनुप्रास अलंकार के 5 उप-भेद होते हैं:
1. छेकानुप्रास:जहाँ कोई वर्ण केवल दो बार आए।
2. वृत्यानुप्रास: जहाँ एक ही वर्ण की आवृत्ति तीन या उससे अधिक बार हो।
3. लाटानुप्रास: जहाँ पूरा का पूरा शब्द या वाक्य खंड दोहराया जाए, लेकिन अन्वय करने पर अर्थ बदल जाए।
4. श्रुत्यानुप्रास: जहाँ एक ही उच्चारण स्थान (जैसे तालु, दंत, कंठ) से बोले जाने वाले वर्णों की आवृत्ति हो।
5. अंत्यानुप्रास: जहाँ पंक्तियों के अंत में तुकबंदी (Rhyme) मिले।

B. यमक अलंकार (Yamak Alankar)

‘यमक’ का अर्थ होता है – जोड़ा (Pair)। जब किसी काव्य में कोई एक शब्द एक से अधिक बार आए (दो या दो से अधिक बार), लेकिन हर बार उसका अर्थ अलग-अलगहो, तो वहाँ यमक अलंकार होता है।

उदाहरण:
“कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय।

वा खाए बौराए जग, या पाए बौराए।”
(स्पष्टीकरण: यहाँ ‘कनक’ शब्द दो बार आया है। पहले ‘कनक’ का अर्थ है ‘धतूरा’ (जिसे खाकर इंसान पागल हो जाता है) और दूसरे ‘कनक’ का अर्थ है ‘सोना/Gold’ (जिसे पाकर भी इंसान घमंड से पागल हो जाता है)।)

“काली घटा का घमंड घटा।”
(स्पष्टीकरण: यहाँ ‘घटा’ शब्द दो बार आया है। पहली ‘घटा’ का अर्थ है बादल, और दूसरी ‘घटा’ का अर्थ है कम होना (Decrease)।)

“तीन बेर खाती थीं, वे तीन बेर खाती हैं।”
(स्पष्टीकरण: यहाँ ‘बेर’ शब्द के दो अर्थ हैं – पहला ‘बेर’ यानी समय (Three times), और दूसरा ‘बेर’ यानी फल (Plum fruit)।)

C. श्लेष अलंकार (Shlesh Alankar)

श्लेष‘ का अर्थ होता है – चिपका हुआ। जब किसी काव्य में कोई शब्द केवल एक ही बार प्रयोग हो, लेकिन प्रसंग के अनुसार उसके अर्थ एक से अधिक निकलें, तो वहाँ श्लेष अलंकार होता है।

उदाहरण:
“रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून॥”
(स्पष्टीकरण: यहाँ दूसरी पंक्ति में ‘पानी’ शब्द के तीन अर्थ चिपके हुए हैं:
1. मोती के लिए – चमक या कांति
2. मनुष्य के लिए – इज्जत या सम्मान
3. चून (आटा/चूना) के लिए – जल)

“सुबरन को खोजत फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर।”
(स्पष्टीकरण: यहाँ ‘सुबरन’ शब्द के तीन अर्थ हैं: कवि के लिए ‘सुंदर अक्षर’, व्यभिचारी के लिए ‘सुंदर रूप-रंग की स्त्री’, और चोर के लिए ‘सोना (Gold)’।)

D. वक्रोक्ति अलंकार (Vakrokti Alankar)

‘वक्र’ का अर्थ है ‘टेढ़ा’ और ‘उक्ति’ का अर्थ है ‘कथन’। जब वक्ता (बोलने वाले) द्वारा कहे गए शब्द का, श्रोता (सुनने वाला) जानबूझकर कोई दूसरा (टेढ़ा) अर्थ निकाल ले, तो वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है।

उदाहरण:
“कौन द्वार पर? ‘हरि’ मैं राधे!
क्या वानर का काम यहाँ?”
(स्पष्टीकरण: श्रीकृष्ण द्वार खटखटाते हैं और कहते हैं कि “मैं हरि (कृष्ण) हूँ”, लेकिन राधा जानबूझकर ‘हरि’ का दूसरा अर्थ ‘बंदर’ निकालती हैं और कहती हैं कि यहाँ बंदर का क्या काम है।)

E. पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार / वीप्सा अलंकार

जब किसी काव्य में घबराहट, आश्चर्य, घृणा, रोचकता या आदर दर्शाने के लिए एक ही शब्द को उसी अर्थ में दोबारा प्रयोग किया जाए।
उदाहरण: “मधुर-मधुर मेरे दीपक जल।”(यहाँ मधुर-मधुर शब्द सुंदरता बढ़ाने के लिए दोहराया गया है।)

2. अर्थालंकार (Arthalankar)

जब कविता या काव्य में शब्दों की बजाय उनके अर्थ के कारण चमत्कार या सुंदरता उत्पन्न होती है, तो उसे अर्थालंकार कहते हैं। यदि हम यहाँ शब्दों की जगह उनके पर्यायवाची शब्द भी रख दें, तो भी अलंकार नष्ट नहीं होता, क्योंकि सौंदर्य अर्थ में छिपा होता है।

अर्थालंकार के कई भेद हैं, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं:

A. उपमा अलंकार (Upma Alankar)

उपमा का अर्थ है तुलनाकरना। जब किसी व्यक्ति या वस्तु की तुलना किसी अन्य प्रसिद्ध व्यक्ति या वस्तु से उसके रूप, गुण, स्वभाव आदि के आधार पर की जाती है, तो वहाँ उपमा अलंकार होता है।
इसकी पहचान के लिए वाक्यों में सा, सी, से, सम, सरिस, समानआदि शब्द आते हैं।


उपमा के चार अंग होते हैं:
1. उपमेय:जिसकी तुलना की जाए (जैसे- मुख)।
2. उपमान:जिससे तुलना की जाए (जैसे- चंद्रमा)।
3. वाचक शब्द: तुलना बताने वाले शब्द (जैसे- सा, सी, समान)।
4. साधारण धर्म: वह गुण जिसके कारण तुलना हो रही है (जैसे- सुंदर)।

उदाहरण:
पीपर पात सरिस मन डोला।”
(स्पष्टीकरण: मन (उपमेय) की तुलना पीपल के पत्ते (उपमान) से की गई है। वाचक शब्द ‘सरिस’ है और डोलना ‘साधारण धर्म’ है।)

“हरिपद कोमल कमल से।”
(स्पष्टीकरण: भगवान के पैरों (हरिपद) की तुलना कमल के फूल से की गई है।)

B. रूपक अलंकार (Rupak Alankar)

जब उपमेय और उपमान में कोई अंतर न दिखाई दे और दोनों को एक ही मान लिया जाए (यानी तुलना नहीं, बल्कि सीधा वही बता दिया जाए), तो वहाँ रूपक अलंकार होता है। इसमें उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप होता है। इसकी पहचान यह है कि इसमें वाचक शब्द (सा, सी) नहीं आते और अक्सर शब्दों के बीच योजक चिह्न (-) लगा होता है।

उदाहरण:
“मैया मैं तो चंद्र-खिलौना लैहों।”
(स्पष्टीकरण: यहाँ चंद्रमा को ही खिलौना मान लिया गया है (चंद्रमा के समान खिलौना नहीं कहा गया)।)

“चरन कमल बंदौ हरिराई।”
(स्पष्टीकरण: भगवान के चरणों को ही कमल कह दिया गया है।)

C. उत्प्रेक्षा अलंकार (Utpreksha Alankar)

जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाती है, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।
पहचान के शब्द:मानो, मनहुँ, जानो, जनहुँ, ज्यों, मनु, जनु।
उदाहरण:

“सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात।
मनहुँ नीलमनि सैल पर, आतप परयो प्रभात॥”

(स्पष्टीकरण: श्रीकृष्ण के सांवले शरीर पर पीले वस्त्र ऐसे लग रहे हैं, ‘मानो’ नीलमणि पर्वत पर सुबह की धूप पड़ रही हो।)

“सिर फट गया उसका वहीं, मानो अरुण रंग का घड़ा।”

D. अतिशयोक्ति अलंकार (Atishayokti Alankar)

जब किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना का वर्णन बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर (Exaggerate करके) किया जाए, जो लोक-सीमा या सामान्य सत्य से परे हो, तो वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।

उदाहरण:
“हनुमान की पूंछ में, लगन न पाई आग।
लंका सिगरी जल गई, गए निसाचर भाग॥
(स्पष्टीकरण: यहाँ बताया गया है कि हनुमान जी की पूंछ में आग लगने से पहले ही पूरी लंका जल गई, जो कि एक बहुत बढ़ा-चढ़ाकर किया गया वर्णन है।)
“आगे नदिया पड़ी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार।
राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार॥”

E. मानवीकरण अलंकार (Manavikaran Alankar)

जब प्राकृतिक चीज़ों (जैसे पेड़, पौधे, बादल, पत्थर, हवा) या निर्जीव वस्तुओं में मानवीय भावनाओं या इंसानी क्रियाओं का वर्णन किया जाए, तो वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।

उदाहरण:
“मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।”
(स्पष्टीकरण: बादल (मेघ) निर्जीव हैं, लेकिन उन्हें इंसानों की तरह सज-धज कर आते हुए दिखाया गया है।)
“फूल हँसे कलियाँ मुसकाईं।”
(स्पष्टीकरण: फूल और कलियों को इंसानों की तरह हँसते और मुस्कुराते हुए दिखाया गया है।)

F. भ्रांतिमान अलंकार (Bhrantiman Alankar)

जब समानता के कारण किसी एक वस्तु को भूलवश दूसरी वस्तु समझ लिया जाए और उसी के अनुसार कार्य भी कर दिया जाए, तो भ्रांतिमान अलंकार होता है। (भ्रम पक्का हो जाता है)।

उदाहरण:
“नाक का मोती अधर की कांति से,
बीज दाड़िम का समझकर भ्रांति से,
देखकर सहसा हुआ शुक मौन है,
सोचता है अन्य शुक यह कौन है।”

(स्पष्टीकरण: उर्मिला की नाक के मोती को तोता (शुक) भ्रम के कारण अनार का दाना समझ लेता है, और उनकी सुंदर नाक को दूसरा तोता समझ लेता है।)

G. संदेह अलंकार (Sandeh Alankar)

जब दो वस्तुओं में इतनी समानता हो कि अंत तक यह तय ही न हो पाए कि असली वस्तु कौन सी है (भ्रम बना रहे), वहाँ संदेह अलंकार होता है।

पहचान शब्द: या, अथवा, कि, कैधौं।

उदाहरण:
“सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है।
सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है॥”
(स्पष्टीकरण: महाभारत में द्रौपदी चीरहरण के समय साड़ी इतनी लंबी हो गई थी कि दुशासन को संदेह हो रहा था कि साड़ी के बीच में नारी है, या नारी ही साड़ी की बनी हुई है।)

H. दृष्टांत अलंकार (Drishtant Alankar)

जब किसी बात को समझाने के लिए किसी दूसरी मिलती-जुलती बात या कहावत का उदाहरण दिया जाए, जिससे पहली बात सिद्ध हो सके।

उदाहरण:
“करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान॥”

I. विभावना अलंकार (Vibhavana Alankar)

जहाँ कारण (Reason) के बिना ही कार्य (Work) का होना पाया जाए, वहाँ विभावना अलंकार होता है।
उदाहरण:
“बिनु पद चलै सुनै बिनु काना।
कर बिनु करम करै विधि नाना॥”
(स्पष्टीकरण: ईश्वर बिना पैरों के चलता है, बिना कानों के सुनता है और बिना हाथों के सारे काम करता है। कारण न होते हुए भी कार्य हो रहा है।)

J. अन्योक्ति अलंकार (Anyokti Alankar)

जब किसी बात को सीधे न कहकर किसी अन्य के माध्यम से (अप्रत्यक्ष रूप से) कहा जाए या ताना मारा जाए, तो अन्योक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण:
“नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास यहि काल।
अली कली ही सौं बिंध्यौ, आगे कौन हवाल॥”

(स्पष्टीकरण: कवि बिहारी ने भौंरे और कली के माध्यम से राजा जयसिंह को उनकी नई रानी के प्रेम में राजकाज भूल जाने पर ताना मारा था।)

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अलंकार पहचानने की शॉर्ट ट्रिक्स (Tricks to Identify Alankar)

परीक्षा के समय जल्दी उत्तर देने के लिए इन ट्रिक्स को याद रखें:
1. अनुप्रास ट्रिक: एक ही अक्षर (अ, अ, अ) बार-बार आए।
2. यमक ट्रिक: एक ही शब्द दो या ज्यादा बार आए, पर हर बार मतलब अलग हो।
3. श्लेष ट्रिक: शब्द एक बार आए, लेकिन उसके अर्थ कई सारे चिपके हों।
4. उपमा ट्रिक: पंक्ति में सा, सी, से, सम, सरिस, समान लगा हो। (तुलना)
5. रूपक ट्रिक: योजक चिह्न (-) लगा हो लेकिन सा, सी, से न हो। (अभेद आरोप)
6. उत्प्रेक्षा ट्रिक: पंक्ति में मानो, जानो, मनहुँ, जनहुँ, जनु, मनु लगा हो।
7. अतिशयोक्ति ट्रिक: बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर) बताया गया हो।
8. मानवीकरण ट्रिक: निर्जीव चीज़ों को इंसानों की तरह काम करते दिखाया जाए।

अलंकार से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: अलंकार का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर: अलंकार का शाब्दिक अर्थ ‘आभूषण’, ‘गहना’ या ‘सजावट’ होता है। जैसे आभूषण पहनने से शरीर की सुंदरता बढ़ती है, वैसे ही अलंकार के प्रयोग से काव्य की सुंदरता बढ़ती है।

प्रश्न 2: अलंकार के मुख्य रूप से कितने भेद होते हैं?
उत्तर: अलंकार के मुख्य रूप से दो भेद माने जाते हैं – 1. शब्दालंकार और 2. अर्थालंकार। हालाँकि, कुछ विद्वान ‘उभयालंकार’ को मिलाकर तीन भेद भी मानते हैं।

प्रश्न 3: ‘कनक कनक ते सौगुनी’ में कौन सा अलंकार है?
उत्तर:इस पंक्ति में **यमक अलंकार** है, क्योंकि यहाँ ‘कनक’ शब्द दो बार आया है और दोनों बार उसका अर्थ अलग-अलग (धतूरा और सोना) है।

प्रश्न 4: उपमा और रूपक अलंकार में क्या अंतर है?
उत्तर: उपमा अलंकार में दो चीज़ों की तुलना की जाती है (जैसे- चंद्र सा मुख), जबकि रूपक अलंकार में तुलना नहीं की जाती बल्कि दोनों चीज़ों को एक ही मान लिया जाता है (जैसे- चंद्रमुख)।

प्रश्न 5: श्लेष और यमक में क्या अंतर है?
उत्तर: यमक में एक शब्द कई बार आता है और हर बार अर्थ अलग होता है। जबकि श्लेष में शब्द सिर्फ एक बार आता है, लेकिन उसके अर्थ एक से ज़्यादा निकलते हैं।

प्रश्न 6: ‘पीपर पात सरिस मन डोला’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार प्रयुक्त हुआ है?
उत्तर: इस पंक्ति में **उपमा अलंकार** है। यहाँ वाचक शब्द ‘सरिस’ का प्रयोग हुआ है और मन की तुलना पीपल के पत्ते से की गई है।

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