Lab assistant 2026 Biology Notes

कोशिका (Cell Biology):

जीवन की सबसे छोटी इकाई कोशिका है, जो संरचना व काम दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण होती है। हर जीवित चीज कोशिकाओं पर आधारित होती है, छोटे से छोटा या बड़े से बड़ा। Robert Hooke ने पहली बार कोशिका को देखा था, यह घटना 1665 में हुई थी। इनके प्रकार दो हैं – एक प्रोकैरियोटिक, तथा दूसरा यूकैरियोटिक। अंदर अलग-अलग अंग पाए जाते हैं: नाभिक होता है, माइटोकॉन्ड्रिया भी होता है, फिर राइबोसोम और गोल्जी तंत्र भी। ऊर्जा का काम माइटोकॉन्ड्रिया करता है, यह ATP बनाकर कोशिका को शक्ति देता है।
जीवन के हरे प्रकारों का अध्ययन।

सूरज की रोशनी के सहारे पौधे खाना बनाते हैं। इस काम में क्लोरोप्लास्ट एक अहम भूमिका निभाता है। कार्बन डाइऑक्साइड घुलकर पानी के साथ मिल जाता है, फिर भोजन बनता है। पानी जाइलम के रास्ते ऊपर तक पहुँचता है। भोजन का झुंड फ्लोएम में चला जाता है। जड़ों का गढ़ दो ढंग का होता है – एक में धागे जैसी छोटी जड़ें, दूसरी में लंबी मुख्य जड़। शरीर कैसे काम करता है, इसको समझने वाला विषय। शरीर अलग-अलग तंत्रों का बना है – उदाहरण के तौर पर पाचन, श्वसन, खून के संचार या फिर उत्सर्जन। भोजन को छोटे रूप में बदलने का काम पाचन तंत्र करता है। ऑक्सीजन लाना और कार्बन डाइऑक्साइड निकालना श्वसन तंत्र का काम है। पूरे शरीर में खून पहुँचाना दिल की ज़िम्मेदारी है। अब गुर्दे आपाधापी के पदार्थों को शरीर से बाहर करते हैं।

आनुवंशिकी (Genetics):

जीवों में लक्छन कैसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते हैं, इसकी खोज आनुवंशिकी में होती है। Gregor Mendel को इस विषय का शुरुआती नाम माना जाता है। DNA वह तत्व है जो गुणों को बच्चों तक पहुँचाने का काम करता है। इन गुणों की छोटी इकाई जीन होती है, जो गुणसूत्रों पर टिकी रहती है।

सूक्ष्मजीव विज्ञान (Microbiology):

लगभग अदृश्य, सूक्ष्मजीव इतने छोटे होते हैं कि आँखें उन्हें पकड़ नहीं पाती। इनकी दुनिया में बैक्टीरिया, वायरस, फफूंद और प्रोटोजोआ भी शामिल हैं। एक ओर दही गाढ़ी करने वाले बैक्टीरिया फायदेमंद साबित होते हैं, दूसरी ओर कई बीमारियाँ पैदा कर देते हैं। उन्हें झांकने के लिए माइक्रोस्कोप का इस्तेमाल प्रयोगशाला में किया जाता है।

कोशिका चक्र (Cell Cycle)

एक कोशिका सबसे पहले अपने आकार में बढ़ती है, फिर उसका DNA दोगुना हो जाता है। इसके बाद वह खुद को दो हिस्सों में बाँट लेती है, जिससे दो नयी कोशिकाएँ बनती हैं। जीव इसी तरह बड़े होते हैं, शरीर बनता है, टूटे-फूटे हिस्से ठीक होते हैं। यह पूरी प्रक्रिया दो बड़े हिस्सों में चलती है – एक तो विश्राम जैसी अवस्था, दूसरी विभाजन की अवस्था।
कोशिका चक्र में सबसे ज्यादा समय अंतरावस्था में ही बितता है। इस दौरान कोशिका खुद को विभाजन के लिए ढालती है। तीन हिस्सों में यह अवधि टूटी होती है – G₁, S, और G₂। आकार में फैलाव के साथ-साथ G₁ में प्रोटीन और एंजाइमों की आपूर्ति होती है। S चरण में DNA खुद को दोगुना कर लेता है, जिससे गुणसूत्रों की दो झलकें उभर आती हैं। फिर G₂ में कोशिका जरूरी बनावटें साधती है, साथ ही ऊर्जा को ठालती है।

अब आती है M अवस्था, जिसे विभाजन अवस्था कहा जाता है। कोशिका का असली बँटवारा यहीं होता है। पहले नाभिक का बँटता है, इसे मिथोसिस कहते हैं, उसके बाद कोशिका द्रव्य दो होता है, जिसे साइटोकाइनेसिस कहा जाता है। मिथोसिस चार हिस्सों में घटित होता है – प्रोफेज, मेटाफेज, एनाफेज और टेलोफेज। गुणसूत्र प्रोफेज में साफ दिखने लगते हैं, नाभिकीय झिल्ली टूटने लगती है। कोशिका के ठीक बीच में गुणसूत्र मेटाफेज में जम जाते हैं। एनाफेज में बहन क्रोमैटिड एक-दूसरे से अलग होकर छोरों की ओर खिंचती हैं। टेलोफेज में दो नए नाभिक बन जाते हैं, फिर साइटोकाइनेसिस होता है और कोशिका दो टुकड़ों में बँट जाती है।

एक माँ-कोशिका से दो नई कोशिकाओं का उदय होता है, इस प्रक्रिया में गुणसूत्रों की गिनती वही रहती है। शरीर के बढ़ने और अंगों के ठीक होने में यह भूमिका निभाती है।

माइटोकॉन्ड्रिया (Mitochondria)

ऊर्जा की बात आए तो माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का दिल कह सकते हैं। इसके बिना कोशिका चल नहीं पाती, क्योंकि यही ईंधन बनाता है। भोजन के छोटे-छोटे टुकड़े यहाँ जलते हैं, ऑक्सीजन की मदद से। उस प्रक्रिया में ATP बनता है, जो ऊर्जा का खर्च का साधन बन जाता है। अगर कोशिका को ढेर सारी शक्ति चाहिए, तो वहाँ ये छोटे अंग भी ज्यादा पाए जाते हैं।

झिल्लियों के दो लेयर में माइटोकॉन्ड्रिया घिरा रहता है। चिकनी सतह बाहरी झिल्ली की होती है, अंदर की ओर तह खाए आंतरिक झिल्ली फैला रहता है, जिन्हें क्रिस्टे बुलाया जाता है। इन तहों से सतह का क्षेत्रफल बढ़ जाता है, परिणामस्वरूप ऊर्जा बनने की प्रक्रिया में गति आती है। एक तरल भीतर भरा रहता है, जिसे मैट्रिक्स का नाम दिया गया है। उसमें कुछ एंजाइम, DNA और राइबोसोम मौजूद होते हैं। अपनी कुछ प्रोटीन खुद बना सकने के कारण इसे आधा स्वतंत्र कोशिका अंग भी कहा जाता है।

ऊर्जा बनाने का काम माइटोकॉन्ड्रिया का होता है, यह कोशिका में साँस लेने जैसी प्रक्रिया से करता है। ग्लूकोज टूटता है, फिर उससे शक्ति मिलती है, ऐसा इस दौरान होता है। इस शक्ति को ATP नामक रूप में भंडारित किया जाता है, कई कामों के लिए तैयार रहती है। बढ़ने में, बँटने में, हिलने-डुलने में – कोशिका की गतिविधियों में यही चलती है।

गोल्जी उपकरण

गोल्जी तंत्र कोशिका का अहम हिस्सा है, जो पदार्थों को सँवारकर उन्हें लिपटा देता है, फिर बाहर भेज देता है। इसे Camillo Golgi ने ढूँढ़ा था, यही कारण है कि इसका नाम उनके नाम पर पड़ गया। असल में यह कई चपटी झीलियों से बना होता है, जिन्हें सिस्टर्नी कहते हैं। ऊपर-नीचे ठहरी ये थैलियाँ एक साथ जुड़ी रहती हैं, घेरे में छोटे-छोटे थैले भी लटके रहते हैं।

गोल्जी कारखाने जैसा काम करता है, प्रोटीन और चर्बी को संभालकर ठीक-ठाक जगह पहुँचाता। एन्डोप्लाज्मिक रेटिकुलम से आये प्रोटीन पहले इसी में रुकते हैं, फिर उनकी सफाई होती है। उसके बाद छोटे-छोटे थैलियों में बंद होकर वे कोशिका के अंदर या बाहर चले जाते हैं। इसी वजह से इसे कोशिका का डाकिया भी कहा जाता है, बिना शोर के काम चलाता।गोल्जी उपकरण पौधा कोशिका में दीवार बनाने में हाथ बँटाता है, लेकिन जानवर की कोशिका में यह हार्मोन छोड़ने जैसे कामों में अहम जगह रखता है।

हरितलवक (Chloroplast)

एक हरा रंग का हिस्सा, जिसे हरितलवक कहते हैं, पौधों की कोशिकाओं में मिलता है। इसके बिना प्रकाश संश्लेषण नहीं हो पाता। ये सिर्फ हरे पौधों और कुछ शैवालों में दिखाई देते हैं। अंदर क्लोरोफिल होता है, जो सूरज की रोशनी सोख लेता है। उसी वजह से पत्तियाँ हरी लगती हैं। प्रकाश की मौजूदगी में, पौधे इसके जरिए कार्बन डाइऑक्साइड और पानी से ग्लूकोज बनाते हैं। साथ में ऑक्सीजन भी छूटती है।

हरितलवक एक ऐसी संरचना है जिसे दो परतों वाली झिल्ली ढकती है। थैलियों के समान आकृतियाँ उसके भीतर मौजूद होती हैं, जिन्हें थायलाकोइड कहा जाता है। ऊपर-नीचे व्यवस्थित रहने वाले ये थायलाकोइड मिलकर ग्राना का निर्माण करते हैं। ग्राना के चारों ओर जो तरल पदार्थ भरा रहता है, उसे स्ट्रोमा कहते हैं। प्रकाश की उपस्थिति में होने वाली क्रिया ग्राना में संपन्न होती है। अंधेरे में चलने वाली प्रक्रिया स्ट्रोमा में घटित होती है।

भोजन बनाने का काम हरितलवक के ज़िम्मे है, यह प्रकाश संश्लेषण से होता है। धरती पर जीवन के लिए यह प्रक्रिया बहुत ज़रूरी है, चूंकि इससे ऑक्सीजन के साथ-साथ खाना भी मिलता है।

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